सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी आरक्षण में उप-वर्गीकरण (Sub-classification) को मंजूरी दे दी है। जानिए क्या है क्रीमी लेयर की अवधारणा और क्यों उठती है जाति जनगणना की मांग?
SC-ST आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला 2024
दरअसल 1 अगस्त, 2024 को सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की बेंच ने आरक्षण के संदर्भ में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि अब से राज्य सरकारें भी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के संदर्भ में उप वर्गीकरण कर सकती है। जो की अभी तक संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत राष्ट्रपति को शक्ति प्राप्त थी जिसके तहत राष्ट्रपति किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के लिए, राज्यपाल से सलाह लेने के बाद, एक पब्लिक नोटिफ़िकेशन के ज़रिए अनुसूचित जाति और जनजाति नोटिफ़ाई कर सकता है।
जातियों का उपवर्गीकरण क्या है?
सुप्रीम कोर्ट के द्वारा दिए गए निर्णय के मुताबिक जातियों के उपवर्गीकरण के अनुसार, जैसे की राज्य की सरकारी नौकरी और सेवाओं में अनुसूचित जातियों को 15% आरक्षण प्राप्त है, अब यदि राज्य सरकार को यह लगता है कि अनुसूचित जातियों में भी विशेष तौर पर कुछ जातियां हैं, जो राज्य की सेवाओं में निचले पायदान पर हैं और वह समाज और साथ ही अनुसुचित जातियों में भी आर्थिक और सामाजिक रूप से काफी पिछड़े हैं तो सरकार उनके लिए उपवर्गीकरण कर सकती है।
यह उपवर्गीकरण की प्रक्रिया कुछ इस प्रकार होती है। जैसे राज्य के आरक्षण से सबसे अधिक फायदा पाने वाले अनुसूचित जातियों को कैटेगरी A और जो ज्यादा फायदा नही ले पाए उनको B कैटेगरी और जो राज्य सरकार की सेवाओं में बिलकुल ही पिछड़े हुए हैं, उनको C कैटेगरी में रखा जाता है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को गौर से देखना ज़रूरी।
आरक्षण के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय देते हुए दो बाते कही एक अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के उपवर्गीकरण की शक्ति राज्यों को प्रदान करना और दूसरा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के संदर्भ में क्रीमी लेयर की अवधारणा।
अब जो पहला निर्णय सुप्रीम कोर्ट ने दिया है अनूसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को लेकर वास्तव में वह कोर्ट का फैसला है, जबकि अनूसूचित जाति और जनजाति में क्रीमी लेयर को जो सुप्रीम कोर्ट ने बोला है, वह एक तरह से राज्यों को सलाह दी गई है, कि वह भविष्य में इस पर विचार करे।
जाति की राजनीति से बचना जरूरी
आरक्षण पर निर्णय देते समय सुप्रीम कोर्ट ने कुछ महत्त्वपूर्ण बात भी कही। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जातियों का उपवर्गीकरण करते समय राज्य सरकार यह ध्यान रखे कि इसके लिए उसको पर्याप्त आंकड़े प्रस्तुत करने होंगे, उसी आधार पर राज्य सरकार जातियों का उपवर्गीकरण कर सकती है। अब सुप्रीम कोर्ट के इस बयान के पीछे का कहने का कारण यह था कि भूतकाल में हम ऐसे हालात देख चुके है। जब उत्तरप्रदेश में सन् 2000 -2002 के बीच बीजेपी की सरकार थी और राजनाथ सिंह मुख्यमंत्री थे, तब हुकुम सिंह के नेतृत्व में एक समिति का गठन किया गया, जिसका कार्य था एससी, एसटी और ओबीसी में पिछड़ेपन के आधार पर जातियों का उपवर्गीकरण। जब इस समिति की उप वर्गीकरण पर रिपोर्ट आई तब अनुसूचित जाति में सबसे अग्रणी थे जाटव जो बसपा का वोट बैंक थे, और ओबीसी में अग्रणी थे यादव जो सपा के वोट बैंक थे। इसी कारण इस समिति की रिपोर्ट को काफी आलोचना का भी सामना करना पड़ा। इसी कारण सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट तौर पर यह कहा कि राज्य सरकारें एससी और एसटी में उपवर्गीकरण करे हुए पर्याप्त आंकड़े प्रस्तुत करेगी। साथ ही राज्य किसी भी जाति जो की एससी और एसटी में शामिल है, उनको आरक्षण देने से मना नहीं कर सकती।
उप-वर्गीकरण में राज्यों की भूमिका और चुनौतियां
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय में राज्यों को एससी और एसटी में उपवर्गीकरण की शक्ति तो प्रदान कर दी है। लेकिन अब इसके राज्य सरकारों को भी कार्य करना पड़ेगा। क्योंकि उपवर्गीकरण के लिए राज्य सरकारों को पर्याप्त तौर पर आंकड़े प्रस्तुत करने होंगे। अब आंकड़े प्रस्तुत करने के लिए राज्य सरकारों को सिर्फ ऑफिस ही नहीं, बल्कि जमीनी सच्चाई का अध्य्यन करना पड़ेगा। और जमीनी हकीकत जानने के लिए राज्य सरकारों को जाति जनगणना करनी ही होगी।
जाति जनगणना क्यों है जरूरी
यदि राज्यों को वास्तव में एससी और एसटी में उपवर्गीकरण करना है। तो जाति जनगणना ही एक माध्यम है जहां राज्य सरकार वास्तव में जमीनी हकीकत का अध्ययन कर, यह जान सकती है कि राज्य के विकास कल्याण की यात्रा के कौन-सी जाति और जनजाति बहुत ज्यादा ही पिछड़ गई हैं। क्योंकि ऐसा भी नहीं है कि एक जनजाति के सभी लोगों का उत्थान हुआ है।
वास्तव में जो अवधारणा है कि इस जाति का एससी में सबसे ज्यादा उत्थान हुआ है, वास्तव में उसमे भी अगर 100 लोग है, तो 90 का हुआ हो, तो 10 अभी भी सामाजिक और आर्थिक रूप से अति पिछड़े हैं। ऐसे में राज्य सरकारों को 90 लोगो के उत्थान को देखकर उस जाति के सभी लोगो का उत्थान हो गया है, इस भूल से बचना होगा।
एससी और एसटी में क्रीमी लेयर अवधारणा क्यों है मुश्किल?
दरअसल जब हम आरक्षण की बात करते है, तब हमें ओबीसी, एससी और एसटी तीनो को अलग नजर से देखना होगा। ओबीसी में क्रीमी लेयर की अवधारणा आर्थिक रूप से पिछड़े लोगो के आधार पर लाई गई है, जो आर्थिक विकास की प्रक्रिया में पीछे रह गए है। वहीं एससी और एसटी जातियों का ऐतिहासिक आधार जातिगत भेदभाव रहा है। जिसके बावजूद आज भी हमे यह कई जगह देखने को मिलता है, कि ऊंचे पद पर होने के बावजूद एससी और एसटी वर्ग के लोग या कर्मचारियों को भेदभाव का सामना करना पड़ता है। ऐसे में ओबीसी में क्रीमी लेयर और एससी, एसटी में क्रीमी लेयर की अवधारणा लाने में दोनो का आधार बहुत अलग होने चाहिए।
केंद्र सरकार ने क्या कहा सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर
केंद्र सरकार ने आरक्षण से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर स्पष्ट जवाब देते हुए कहा कि कैबिनेट बाबा साहब भीमराव अंबेडकर जी के संविधान के अनुसार आरक्षण की प्रणाली को बनाए रखेगा और अनुसूचित जाति और जनजाति में किसी भी तरह के क्रीमी लेयर की अवधारणा को नही लाया जाएगा। साथ ही एससी और एसटी में उपवर्गीकरण को लेकर भी केंद्र सरकार ने किसी भी बदलाव को खारिज कर दिया।



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